http://marwaralakh.com/uploads/images/ads/adds.jpg
Breaking News

माता-पिता की याचिका पर पहली बार सर्वोच्च न्यायालय ने दी इच्छा मृत्यु की अनुमति

  • 11 Mar, 2026
http://marwaralakh.com/uploads/images/ads/adds.jpg

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 13 वर्षों से कोमा में पड़े युवक हरीश राणा के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाने की अनुमति दे दी है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने एम्स (AIIMS) को निर्देश दिया कि पूरी प्रक्रिया मरीज की गरिमा को ध्यान में रखते हुए सावधानीपूर्वक पूरी की जाए। देश में इस तरह का यह पहला मामला माना जा रहा है, जिसमें अदालत ने इस प्रकार की अनुमति दी है।
माता-पिता की याचिका पर आया फैसला
यह फैसला हरीश राणा के माता-पिता निर्मला राणा और अशोक राणा की ओर से दायर याचिका पर सुनाया गया। उन्होंने अदालत से अपने बेटे को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) देने की अनुमति मांगी थी। उनका कहना था कि पिछले 13 वर्षों से उनका बेटा कोमा में है और उसके ठीक होने की कोई संभावना डॉक्टरों ने नहीं बताई है।
दिल्ली में जन्मे हरीश राणा चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। वर्ष 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद उनके पूरे शरीर में लकवा मार गया और वह कोमा में चले गए। तब से वह न बोल पा रहे हैं और न ही किसी प्रकार की प्रतिक्रिया दे पा रहे हैं।
डॉक्टरों के अनुसार हरीश क्वाड्रिप्लेजिया नामक गंभीर स्थिति से पीड़ित हैं। इस स्थिति में मरीज पूरी तरह फीडिंग ट्यूब और वेंटिलेटर सपोर्ट पर निर्भर हो जाता है और उसके ठीक होने की संभावना बेहद कम होती है। लंबे समय से बिस्तर पर पड़े रहने के कारण उनके शरीर पर कई जगह गहरे घाव भी बन गए हैं।
कोर्ट ने बताए दो अहम आधार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि लाइफ सपोर्ट हटाने का निर्णय दो प्रमुख आधारों पर होना चाहिए। पहला, यह चिकित्सा उपचार की श्रेणी में आता हो। दूसरा, यह मरीज के सर्वोत्तम हित में हो। फैसला सुनाते हुए जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि डॉक्टर का कर्तव्य मरीज का इलाज करना है, लेकिन जब ठीक होने की कोई संभावना न हो, तो परिस्थितियों के अनुसार अलग निर्णय लेना पड़ सकता है।
केंद्र सरकार को कानून बनाने की सलाह
अदालत ने केंद्र सरकार से पैसिव यूथेनेशिया पर स्पष्ट कानून बनाने पर भी विचार करने की सलाह दी है। फिलहाल भारत में यह केवल सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के आधार पर ही संभव है, जिसमें मरीज की स्थिति पर दो मेडिकल बोर्ड की राय आवश्यक होती है।
यह फैसला इच्छामृत्यु और मरीज के अधिकारों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।

http://marwaralakh.com/uploads/images/ads/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *